महारथी कर्ण के वीरगति के पश्चात्
रातरी में अर्जुन श्री कृष्ण के पास जाते है और उनसे कहने लगते है।
बड़ा गर्व था करण को अपने धनुर्विद्या पर वो सर्वदा मुझसे बराबरि करने का दुस्साहस करता था
परंतू वो मेरे बराबर तो क्या मेरे चरणो के धूल के बराबर भी नहीं था
श्री कृष्ण जी को ये सब सुनकर बहुत आश्चर्य होने लगता है।
अर्जुन कह्ता है जो सर्वदा अहंकार से शिर उठाकर बाटे करने का दुस्साहस करता था
जीस्का शिर कभी हम पांडवो के सामने झुका नहीं था उसी कर्ण का शिर ही आज मैंने उसके धड़ से अलग कर दिया है।
कर्ण का सारा गर्व सारा अभिमान और सारा घमंड चूर चूर कर दिया है मैन।
श्री कृष्ण चुप चाप ही अर्जुन की बात सुन रहे थे और उन्हें पता चल गया था की ये अर्जुन नहीं उसका अहंकार बोल रहा है।
फिर अर्जुन बोलता है केषव तुम व्यर्ध ही कर्ण को महत्त्व दे रहे थे तुम व्यर्थ ही कर्ण की प्रशंषा करते थे
अरे मैंने तो उसे बार बार पराजित किया था बार बार हर बार
फिर श्री कृष्ण जी बोलते हे पार्थ कर्ण तुमसे बार बार पराजित हुआ है परन्तु इसका अर्थ ये नहीं की कर्ण एक श्रेस्ट योद्धा नहीं था
अर्जुन बोलते है की तुम कहना क्या चाहते हो केषव में श्रेष्ठ योद्धा नहीं , क्या में सर्व श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं हूँ
श्री कृष्ण जी बोलते है
पार्थ पितामाह भीष्म तुम्हारे वानो के कारन निष्क्रिय हुए थे न तो क्या तुम उनसे भी श्रेस्ट धनुधर हो गए
इसमे अर्जुन कह्ता है नहीं केषव पितामाह भीष्म की बात दूसरी थी में उनसे श्रेस्ट कभी नहीं था
परंतू कर्ण से में अवस्य श्रेस्ट हूँ पता नहीं तुम कर्ण का ही पक्ष क्यों ले रहे हो।
मैने जब भी कर्ण के रथ पर वाण चलए है तो मेरे वाण के प्रहार से कर्ण का रथ १० कदम पीछे हट जाता था
और कर्ण जब मेरे रथ पर वाण चलता था तो मेरा रथ केवल २ कदम पीछे हटता था
फिर भी तुम कर्ण की प्रशंसा में वाह वाह करते थे मेरी नहीं क्या दोनों के वानो के प्रहारो की शक्ति में इतना अंतर यह सिद्ध नहीं करता की में श्रेस्ट धनुधर हूँ
श्री कृष्ण जी बोलते है नहीं
इसमे अर्जुन बोलते है परन्तु क्यों केषव
फिर श्री कृष्ण जी बोलते है पार्थ तुम मेरे मित्र हो मेरे सखा हो तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो इसलिए मैंने तुमसे कभी कुछ भी नहीं छुपाये है।
यह तक की अपना दिव्या विराट रूप भी तुम्हे दिखाया है तुम तो मुझे पहचानते हो की मैं कोण हूँ
फिर अर्जुन हाथ जोड़कर बोलते है हे केषव में जनता हूँ की तुम त्रिलोकि नाथ हो
श्री कृष्ण जी बोलते है तो फिर तुम्हारे जिस रथ पर मैं त्रिलोक का भार लेकर स्वयम मैं बैठा था
उस रथ को कोई अणु मात्र भी पीछे हटा सकता था ।।।। नहीं न
तो फिर कर्ण जब अपने हर प्रहार पर तुम्हारे रथ को केवल २ कदम पीछे हटा देता था
ओर तुम उसके रथ को १० कदम पीछे हटा देते थे तो तुम ही निर्णय लो पार्थ की किस्के वांनो में अधिक शक्ति थी।
पार्थ असल में कर्ण तुम्हारा प्रथम शत्रु नहीं है बल्कि अहंकार तुम्हारा प्रथम शत्रु है। जिसके अधीन होकर तुम बोल रहे हो.
इसके आलावा भी श्री कृष्ण जी ने कही बार कर्ण के घातक अस्त्रो से अर्जुन को बचाया था
जब कर्ण ने वैष्णव अस्त्र चलाया था इससे पहले की अर्जुन उस अस्त्र का कोई उत्तर देता वैष्णव अस्त्र अधिक गति के साथ अर्जुन की और आ गया था
तब श्री कृष्ण जी वैष्णव अस्त्र के सामने. आ गए थे और फिर वैष्णव अस्त्र एक फुलो की माला बनकर श्री कृष्ण जी के गले मैं अर्पण हो गए थे
ओर जब कर्ण ने नागराज तक्षक से प्राप्त नाग अस्त्र का पर्योग किया था तब भी श्री कृष्ण जी ने अपने पैर के अँगूठे से रथ को धरती में ढसा दिया था
जीस्के कारन नाग अस्त्र अर्जुन के मुकुट पे जा लगी थी।
ईसी तरह कही बार भगवन कृष्ण ने अर्जुन की प्राणो की रक्षा की थी।
ये ईस बात का प्रमाण है की कर्ण अर्जुन से श्रेष्ठ था.
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