भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है। भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं
ओर हनुमान जी भोले नाथ के ११बे रूद्र अवतार है। जिन्हे संकट मोजन राम भक्त कहा जाता है। जब प्रभु राम अश्वमेघ यज्ञ कर रहे द। तब भगवन राम ने हनुमान जी को अश्वमेघ यज्ञ की घोडे की राशा का दायित्व दिया ठ।। और श्री राम की आज्ञा पाकर हनुमान अपने सेना सहित निकल पढ।। यागया का घोडा जिस जिस राज्य से होकर गुज़रता रहा वह राज्य के राजा को भगवन राम को चक्रवर्ती सम्राट बनाने हेतु उनके अधीनता स्वीकार करना होता त।। १ एक करके सभी राज्य प्रभु राम के अधीनता स्वीकार करने लगी क्युकी उन सभी राजयो को ये ज्ञात था की राम ही भगवन विष्णु का स्वरुप है।।। परंतू १ राजा ऐसा था जिनहे किसी के अधीनता स्वीकार नहीं थी वाह राजा वीरमणि थे जो की महादेव के प्रिय भक्त द।। नित्या उनकी पूजा किया करते द।। उनके इसी भक्ति से प्रशन्न होकर महादेव ने उन्हें धर्षण दिया।। और कहा में तुम्हारे भक्ति से अत्यन्त प्रशन्न हु मानगो क्या वर चहिये।। इतना सुनते ही वीरमणी ने शिव शंकर से बचन माँगा की हे प्रभु आपको मेरे पुकारने पर किसी भी परिस्थिति में मेरी रक्षा करने ाना होगा।।। इस प्रकार वीरमणी को भोलेनाथ से यह वरदान प्राप्त हुआ।। जब अश्मेघ का घोडा राजा वीरमणि के राज्य के समीप से गुजर रहा था तभी उन्होंने यज्ञ के घोड़े को अपने अधीन कर लिया और भगवन राम से युद्ध को तटपर हो गै।। याही देखकर हनुमान जी सेना सहित ा गए और वीरमणी जी को समझने का प्रयत्न करने लगे परन्तु वह किसी की न समझे और युद्ध के लिए हनुमान जी को लालकरा।। पहिर हनुमान जी और उनके मध्य में युद्ध आरम्भ हो गया।। दोनों सेनाओं १ से बढ़कर १ दिव्या ाष्ट्रो की भयंकर युद्ध छिड़ गायी।।
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